लेख - गोपाल साधना नामदेव, राजनैतिक विश्लेषक 
दुनिया आज जिस दौर से गुजर रही है, वह केवल कूटनीतिक तनाव या क्षेत्रीय संघर्षों का समय नहीं है। यह वह समय है जब पूरी मानव सभ्यता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहाँ शांति और युद्ध के बीच की दूरी पहले से कहीं अधिक कम हो गई है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, पश्चिम एशिया में भड़कते संघर्ष और महाशक्तियों की सैन्य तैयारियाँ यह संकेत दे रही हैं कि विश्व धीरे-धीरे एक ऐसे रास्ते की ओर बढ़ रहा है जहाँ शांति की संभावना कमजोर और टकराव की आशंका मजबूत होती जा रही है।

इतिहास हमें यह सिखाता है कि युद्ध कभी अचानक नहीं आता। उसके पहले अविश्वास बढ़ता है, संवाद कम होता है, शक्ति प्रदर्शन बढ़ता है और धीरे-धीरे ऐसी स्थिति बन जाती है जहाँ समझदारी की जगह हथियारों की भाषा बोलने लगती है। जब युद्ध आरम्भ होता है, तब उसका प्रभाव केवल युद्धभूमि तक सीमित नहीं रहता। उसकी आंच सीमाओं को पार कर समाज, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन के हर क्षेत्र तक पहुँच जाती है।
जिन लोगों को हर समस्या का समाधान लड़ाई और टकराव में दिखाई देता है, उन्हें एक बार ठहरकर सोचना चाहिए। हम जिस देश और प्रदेश में रहते हैं, वहाँ अभी युद्ध की सीधी आग नहीं पहुँची है। गाँवों में किसान अपने खेतों में काम कर रहे हैं, शहरों में लोग अपने रोज़गार में लगे हुए हैं, बच्चे विद्यालयों में पढ़ रहे हैं और बाजारों में सामान्य जीवन चलता दिखाई देता है। लेकिन इस सामान्य जीवन के भीतर भी कहीं न कहीं युद्ध की दूर की आहट महसूस होने लगी है।

देश के कई हिस्सों से रसोई गैस की कमी की खबरें सामने आने लगी हैं। गाँव हो या शहर, गैस सिलेंडर पाने के लिए लोगों को लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ रहा है। कई स्थानों पर लोगों को घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है और फिर भी सिलेंडर मिलना सुनिश्चित नहीं होता। कुछ जगहों पर गैस की कमी के कारण छोटे-छोटे भोजनालयों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा है। इसके साथ ही पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की अफवाहों ने भी लोगों के भीतर बेचैनी पैदा कर दी है। कई स्थानों पर लोग आवश्यकता से अधिक ईंधन भरवाने के लिए पेट्रोल पंपों पर भीड़ लगा रहे हैं। संकट की आशंका में लोग वर्तमान की व्यवस्था को ही अस्थिर करने लगते हैं।

दुखद यह है कि ऐसे समय में कुछ लोग समाज की मजबूरी का लाभ उठाने लगते हैं। कहीं-कहीं ईंधन और गैस की कालाबाजारी की खबरें सामने आने लगी हैं। कुछ लोग जरूरत से अधिक सामान जमा करके बाद में उसे ऊँचे दामों पर बेचने का प्रयास कर रहे हैं। यह स्थिति हमें यह समझने के लिए मजबूर करती है कि युद्ध भले ही हजारों किलोमीटर दूर हो रहा हो, लेकिन उसका प्रभाव धीरे-धीरे हमारे गाँव, हमारे शहर, हमारे प्रदेश और हमारे देश तक पहुँच सकता है।

यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो उसका सीधा असर हमारे देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं तो परिवहन महंगा हो जाता है। जब परिवहन महंगा होता है तो खेत से बाजार तक आने वाली हर वस्तु की कीमत बढ़ने लगती है। अनाज, दाल, सब्जी, दूध, निर्माण सामग्री सब धीरे-धीरे महंगे होने लगते हैं। मतलब युद्ध कहीं और हो रहा होता है, लेकिन उसकी कीमत आम आदमी को अपनी जेब से चुकानी पड़ती है।

अब ज़रा अपनी कल्पना को उन शहरों तक ले जाइए जहाँ इस समय युद्ध की भयावहता वास्तविकता बन चुकी है। सोचिए तेहरान और तेलअवीव जैसे शहरों के बारे में। वहाँ आसमान से मिसाइलें गिर रही हैं, बमों की आवाजें गूंज रही हैं, तेल शोधन संयंत्र जल रहे हैं और काले धुएँ से आसमान ढक गया है। जिन सड़कों पर कभी जीवन की चहल-पहल रहती थी, जहाँ बच्चे खेलते थे और परिवार शाम को टहलने निकलते थे, वहाँ आज भय और सन्नाटा पसरा हुआ है। कल्पना कीजिए उस माँ की स्थिति, जिसका छोटा बच्चा चेतावनी देने वाले सायरन की आवाज सुनकर डर के मारे उससे लिपट जाता है। सोचिए उस पिता के बारे में जो अपने परिवार को सुरक्षित स्थान तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसे यह भी नहीं पता कि वास्तव में सुरक्षित स्थान कहाँ है।

युद्ध केवल इमारतों को नहीं गिराता, युद्ध इंसानों के भीतर से सुरक्षा की भावना को नष्ट कर देता है। युद्ध बच्चों का बचपन छीन लेता है। युद्ध समाज के विश्वास को तोड़ देता है। इतिहास के पन्ने इस सच्चाई के गवाह हैं कि युद्ध ने अनेक महान सभ्यताओं और संस्कृतियों को उजाड़ दिया है। बीसवीं शताब्दी में हुए प्रथम विश्व युद्ध और दूसरे विश्व युद्ध जैसे दो बड़े युद्धों ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। करोड़ों लोग मारे गए, शहर खंडहर बन गए और समाज को सामान्य होने में दशकों लग गए। दूसरे विश्व युद्ध के अंत में हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए गए। कुछ ही क्षणों में पूरा शहर जलती राख में बदल गया। हजारों लोग तुरंत मारे गए और जो बच गए, वे भी वर्षों तक विकिरण के दुष्प्रभाव झेलते रहे। यह घटना मानव इतिहास की सबसे भयावह चेतावनियों में से एक बन गई। इसी प्रकार लंबे समय तक चले वियतनाम वॉर ने वियतनाम जैसे देश को बुरी तरह तबाह कर दिया। खेत बंजर हो गए, जंगल नष्ट हो गए और लाखों लोग विस्थापित हो गए। समाज को सामान्य होने में पीढ़ियाँ लग गईं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि युद्ध कभी भी केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहता। वह समाज की जड़ों को हिला देता है, संस्कृति को नष्ट कर देता है और मानव सभ्यता को पीछे धकेल देता है।

ऐसे समय में भारतीय संस्कृति की शिक्षाएँ हमें एक अलग मार्ग दिखाती हैं।  भारतीय सभ्यता के महान ग्रंथ महाभारत में भी शांति की महत्ता को अत्यंत गहराई से समझाया गया है। जब कौरव और पांडवों के बीच युद्ध की स्थिति बन चुकी थी और पूरा आर्यावर्त दो भागों में बँटने की कगार पर खड़ा था, तब श्रीकृष्ण ने अंतिम क्षण तक युद्ध को टालने का प्रयास किया। वे स्वयं शांति दूत बनकर हस्तिनापुर गए थे ताकि दोनों पक्षों के बीच समझौता हो सके और लाखों लोगों के जीवन को विनाश से बचाया जा सके।
उस समय युधिष्ठिर सहित पांडवों के सामने प्रश्न था कि क्या उन्हें अपने अधिकारों के लिए युद्ध करना चाहिए या शांति के लिए कुछ समझौता स्वीकार कर लेना चाहिए। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण ने शांति की महत्ता को समझाते हुए कहा कि शांति का कोई मूल्य नहीं होता। यदि शांति मिल सकती है तो उसे जैसे भी मिले स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि युद्ध का परिणाम चाहे जो भी हो, उसमें सबसे अधिक नुकसान सामान्य मनुष्यों का ही होता है।

श्रीकृष्ण ने यह भी समझाया कि युद्ध केवल दो पक्षों के बीच शक्ति प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि वह पूरे समाज को प्रभावित करता है। युद्ध में केवल योद्धा ही नहीं मरते, बल्कि असंख्य परिवार उजड़ जाते हैं, माताएँ अपने पुत्रों को खो देती हैं, पत्नियाँ विधवा हो जाती हैं और बच्चों के सिर से पिता का साया उठ जाता है। खेत उजड़ जाते हैं, नगर नष्ट हो जाते हैं और वर्षों की सभ्यता कुछ ही दिनों में राख में बदल जाती है


इसी धरती पर आगे चलकर गौतम बुद्ध ने करुणा और अहिंसा का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि घृणा का अंत घृणा से नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा से होता है। भारत की इसी धरती पर महावीर ने अहिंसा को जीवन का सर्वोच्च धर्म बताया। उनका संदेश यह था कि यदि मनुष्य अपने भीतर की हिंसा को नियंत्रित कर ले, तो समाज में शांति स्वतः स्थापित हो सकती है।

आधुनिक भारत के इतिहास में भी शांति और अहिंसा की सबसे प्रभावशाली आवाज़ महात्मा गांधी के रूप में सामने आई। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि बिना हथियार उठाए भी अन्याय और साम्राज्यवादी सत्ता का मुकाबला किया जा सकता है। उनका विश्वास था कि अहिंसा केवल नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि समाज और राजनीति को बदलने की सबसे शक्तिशाली विधि है।
गांधीजी कहा करते थे कि “आँख के बदले आँख पूरे संसार को अंधा बना देगी।” यह वाक्य आज की दुनिया के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था। यदि हर संघर्ष का उत्तर प्रतिशोध से दिया जाएगा, तो अंत में पूरी मानवता ही अंधकार में डूब जाएगी।

आज जब दुनिया फिर से संघर्षों की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, तब इन महान परंपराओं और विचारों की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। कम से कम हम अपने समाज में यह प्रयास तो कर सकते हैं कि छोटी-छोटी बातों पर संघर्ष और कटुता न बढ़े। हम एक दूसरे का अधिकार न छीनें। संकट के समय कालाबाजारी और लालच से दूर रहें। ऐसी स्थिति न बनने दें कि हर छोटी बात के लिए हमें न्यायालय, कचहरी और थाने के चक्कर लगाने पड़ें।

यदि हम अपने घर, अपने समाज और अपने आसपास के वातावरण में शांति, सहयोग और संवेदनशीलता की भावना को मजबूत कर सकें, तो यही मानवता के पक्ष में हमारा सबसे बड़ा योगदान होगा। क्योंकि इतिहास हमें बार-बार चेतावनी देता है जब तक संवाद और समझौते का रास्ता खुला है, तब तक शांति को हर कीमत पर बचाने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि एक बार युद्ध आरम्भ हो जाने के बाद उसका नियंत्रण किसी के हाथ में नहीं रहता, और उसका परिणाम केवल विनाश ही होता है।

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