सागर। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय एक बार फिर सुर्खियों में है—इस बार वजह है लॉ और MBA विभाग की संविदा नियुक्तियां, जिन पर “सेटिंग” और पारदर्शिता की कमी के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी ने पूरी चयन प्रक्रिया पर सवालों का तूफान खड़ा कर दिया है। दावा किया जा रहा है कि जिन नामों पर मुहर लगने वाली है, वे पहले से ही “फिक्स” बताए जा रहे हैं।

 पहले से तय नाम? चयन प्रक्रिया पर उठे सवाल
बताया जा रहा है कि इन पदों के लिए अधिसूचना 27 नवंबर 2025 को जारी की गई थी आमंत्रित किए गए थे। लेकिन अब जब चयन प्रक्रिया आगे बढ़ी है, तो अंदरखाने से ऐसी बातें निकलकर आ रही हैं, जिनसे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता कटघरे में खड़ी नजर आ रही है।
सूत्रों का दावा है—“जो नाम सामने आ रहे हैं, वे पहले से ही तय माने जा रहे हैं।”

 10 साल से पढ़ा रहे गेस्ट फैकल्टी किनारे?
सबसे बड़ा सवाल उन अतिथि शिक्षकों को लेकर उठ रहा है, जो वर्षों से विश्वविद्यालय में सेवाएं दे रहे हैं।
जानकारी के मुताबिक, लॉ विभाग में कई गेस्ट फैकल्टी पिछले करीब 10 साल से पढ़ा रहे हैं, और उनके पास वही योग्यता है जो इन पदों के लिए मांगी गई थी।

 इसके बावजूद आरोप है कि:
अनुभवी और स्थानीय उम्मीदवारों को नजरअंदाज किया जा रहा है
बाहरी उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जा रही है
सूत्रों के अनुसार, संभावित चयन सूची में एक उम्मीदवार उत्तर प्रदेश(गोरखपुर)और दूसरी वर्धा (नागपुर) से जुड़ी बताई जा रही है। अब देखना ये होगा कि विश्विद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर परिणाम खुलने के बाद क्या इन्हीं नामों पर मुहर लगती है या नहीं 

 योग्यता पर भी उठे सवाल
चर्चा यह भी है कि जिन उम्मीदवारों को प्राथमिकता मिल रही है, उनके अनुभव पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

 सूत्रों का दावा:
“लोकल उम्मीदवारों के पास ज्यादा अनुभव है, लेकिन चयन में उन्हें पीछे किया जा रहा है।”
हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अब तक नहीं हो पाई है।

पहले भी विवादों में रहा विभाग
मामले को और गंभीर बनाता है विभाग का पिछला रिकॉर्ड।
विधि विभाग के डीन पहले भी विवादों में रह चुके हैं
हाल ही में MBA विभाग में कथित गड़बड़ी की खबर एक प्रतिष्ठित अखबार में भी प्रकाशित हुई थी
इन घटनाओं के बाद अब नई भर्ती प्रक्रिया पर शक और गहरा गया है।

 चुप्पी में प्रशासन, जवाब का इंतजार
सबसे हैरानी की बात यह है कि पूरे विवाद पर अब तक विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

 अगर आरोप सही, तो बड़ा घोटाला!
अगर सामने आ रहे आरोपों में सच्चाई पाई जाती है, तो यह मामला न सिर्फ संविदा नियुक्तियों बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल खड़ा कर सकता है।

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