चोरी की FIR कर पुलिस को गुमराह कर घटिया निर्माण छुपाने की कोशिश तो नहीं कर रहे ठेकेदार
अनूपपुर
शहडोल से अमरकंटक मार्ग के किरर घाट क्षेत्र में एमपीआरडीसी द्वारा कराए गए सड़क एवं चट्टान सुरक्षा कार्य एक बार फिर विवादों में आ गए हैं। करीब 16 करोड़ रुपये की लागत से कराए जा रहे इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट में बड़े पैमाने पर तकनीकी मानकों की अनदेखी और निर्माण में गड़बड़ी के गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्थानीय नागरिकों, तकनीकी जानकारों और शिकायतकर्ताओं ने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
यह मार्ग शहडोल से राजेंद्रग्राम होते हुए अमरकंटक तक जाता है और धार्मिक व पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। अमरकंटक नर्मदा नदी के उद्गम स्थल के रूप में देशभर में प्रसिद्ध है, जहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। ऐसे में इस मार्ग की सुरक्षा और गुणवत्ता अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। बीते दिनों प्रकाशित खबर के बाद अधिकारियों के निर्देश पर ठेका कंपनी ने रिपेयरिंग कि कुछ काम लगाया हुआ है लेकिन जानकारों की माने तो गड़बड़ियां जिस स्तर की हैं, उस स्तर पर सुधार अब लगभग असंभव है, सिर्फ कार्रवाई ही हो सकती है।
रॉकफॉल प्रोटेक्शन सिस्टम पर सवाल
किरर घाट के लगभग 4 किलोमीटर लंबे हिस्से में चट्टानों के गिराव को रोकने के लिए स्टील वायर मेश और रॉक एंकरिंग (रूफ बोल्ट) सिस्टम लगाया गया है। लेकिन स्थल निरीक्षण में पाया गया है कि कई स्थानों पर यह जाली ढीली हो रही है और रूफ बोल्ट निकलते हुए दिखाई दे रहे हैं। इससे कभी भी पत्थर गिरने की संभावना बनी हुई है, जो राहगीरों और वाहनों के लिए गंभीर खतरा है।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, इस कार्य के लिए एस्टीमेट में लगभग 18,000 रूफ बोल्ट लगाए जाने थे, लेकिन मौके पर केवल 9,000 से 10,000 के बीच ही बोल्ट लगाए गए हैं। यह अंतर सीधे तौर पर सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की ओर संकेत करता है।
इतना ही नहीं, रूफ बोल्ट के साथ लगाए जाने वाले वॉशर प्लेट की मोटाई भी निर्धारित मानकों से कम पाई गई है। जहां एस्टीमेट के अनुसार 50 से 60 मिमी मोटाई के वॉशर प्लेट लगाए जाने थे, वहीं वास्तविकता में केवल 25 से 30 मिमी मोटाई के प्लेट ही लगाए गए हैं।
रिटेनिंग वॉल में भी ‘मेकअप’ का आरोप
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जिन स्थानों पर कंक्रीट रिटेनिंग वॉल का निर्माण प्रस्तावित नहीं था, वहां भी अनावश्यक निर्माण किया गया। वहीं कई पुराने और जर्जर रिटेनिंग वॉल को सिर्फ ऊपर से लिपाई-पुताई कर नया निर्माण दर्शाया गया और उसी आधार पर भुगतान भी लिया गया।
सीसी रोड निर्माण में भी बड़ा अंतर
घाट में बनाई गई सीसी सड़क की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। एस्टीमेट के अनुसार सड़क की मोटाई 500 मिमी होनी थी, लेकिन मौके पर केवल लगभग 300 मिमी मोटाई की सड़क बनाई गई है। कई स्थानों पर इस कमी को छिपाने के लिए ऊपर से डामर (बिटुमिनस) की परत चढ़ा दी गई है, जिसकी गुणवत्ता भी दोयम दर्जे की बताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस प्रकार का निर्माण लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होता और जल्द ही सड़क क्षतिग्रस्त हो सकती है।
पेटी ठेकेदारी और संदिग्ध कनेक्शन
प्राप्त जानकारी के अनुसार इस कार्य का टेंडर केसीसी बिल्डकॉन प्राइवेट लिमिटेड, गुरुग्राम (हरियाणा) को वर्ष 2023-24 में दिया गया था। कंपनी ने इस कार्य को ‘गतिमान’ नामक एजेंसी को पेटी ठेके में दे दिया। सूत्रों के अनुसार ‘गतिमान’ से जुड़े एमपी हेड के रूप में राकेश गुप्ता,केसीसी से जुड़े महेंद्र सिंह का नाम सामने आ रहा है, हालांकि सूत्रों की माने तो इस पूरी व्यवस्था को भोपाल के एक सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर सुनील वर्मा,जिनका गतिमान में पार्टनर होने के कुछ तथ्य भी सामने आये है जिनकी इस कंपनी में लगभग 50 प्रतिशत हिस्सेदारी बताई जा रही है। वही इस भ्र्ष्टाचार में तत्कालीन एजीएम और डीएम पर भी सवाल खड़े हो रहे है वजह भी बिल्कुल साफ है क्योंकि उक्त ‘गतिमान’ कंपनी को वर्तमान में सागर (मध्यप्रदेश) में भी दो बड़े टेंडर प्राप्त हुए हैं, जिनके सर्टिफिकेट और पात्रता पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं। वही सूत्रों की माने तो शहडोल के बाद कंपनी को सागर के टेंडर में फायदा दिलाने एजीएम को सागर में पदस्थ करवाया गया है जिसकी जांच के लिए शिकायत कर्ता अब EOW का रुख करने की बात कह रहे है
तकनीकी प्रक्रियाओं की अनदेखी का आरोप
विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रकार के घाट क्षेत्रों में कार्य के दौरान,दीवाल में लगने वाले वोल्ट की साइज,मोटाई, लंबाई, वजन का तय मापदंड ,जाली का स्टैंडर्ड मानक , जियोटेक्निकल सर्वे, स्लोप स्टेबिलिटी एनालिसिस, एंकर पुल-आउट टेस्ट और थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट जैसे महत्वपूर्ण परीक्षण अनिवार्य होते हैं। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह संदेह जताया जा रहा है कि इन प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। यदि ऐसा है, तो यह न केवल तकनीकी लापरवाही है बल्कि यात्रियों की सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ भी है।
शिकायतों पर कार्रवाई नहीं
स्थानीय लोगों का कहना है कि इस मामले की शिकायत संबंधित अधिकारियों, जिनमें जिला प्रशासन और विभागीय इंजीनियर शामिल हैं, को की जा चुकी है। यहां तक कि सीएम हेल्पलाइन में भी शिकायत दर्ज कराई गई थी, लेकिन बिना ठोस निराकरण के कई शिकायतें बंद कर दी गईं।
इससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं या फिर यहां यह कहना भी गलत नहीं होगा की स्थानीय स्तर पर अधिकारियों की मिलीभगत के बिना कोई भी कम्पनी इतना घटिया निर्माण नहीं कर सकती
कंपनी ने चोरी का हवाला देकर पल्ला झाड़ा
आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, निर्माण कंपनी ने अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है कि मौके से कई रूफ बोल्ट और स्टील जाली चोरी हो गई हैं। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यह कदम संभावित अनियमितताओं से बचने के लिए उठाया गया है।और यदि चोरी की बात सत्य भी है फिर भी जो निर्माण सामने है उसमे घटिया क्वालिटी साफ दिख रही हे लेकिन जिम्मेदारों द्वारा कार्यवाही न करना पूरे मामले को संदिग्ध बना रही है जिससे स्पष्ट होता है कि दाल में कुछ तो काला है या फिर पूरी दाल काली है
सुरक्षा पर मंडरा रहा खतरा
किरर घाट क्षेत्र भौगोलिक रूप से संवेदनशील है, जहां बारिश और ढलान के कारण चट्टान गिरने की घटनाएं आम हैं। ऐसे में यदि सुरक्षा कार्य ही मानकों के अनुरूप नहीं होगा, तो किसी भी समय बड़ी दुर्घटना हो सकती है।
स्वतंत्र जांच और ऑडिट की मांग
स्थानीय नागरिकों और शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि पूरे कार्य का स्वतंत्र तकनीकी निरीक्षण कराया जाए। साथ ही थर्ड-पार्टी क्वालिटी ऑडिट, स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट और सोशल ऑडिट भी कराया जाए। इसके अलावा निर्माण कार्य से जुड़े भुगतान, बिल और टेंडर प्रक्रिया की भी विस्तृत जांच कराने की मांग की गई है। यदि अनियमितताओं की पुष्टि होती है, तो संबंधित ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं, बल्कि सीधे तौर पर जनसुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में होने वाली किसी भी बड़ी दुर्घटना के लिए जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाएगा।
इन लोगों की भूमिका पर उठ रहे सवाल
NHAI के तत्कालीन अधिकारी DM, AGM ,सिविल इंजिनियर ,KCC कंपनी, पेटी कॉन्ट्रेक्टर राकेश गुप्ता और सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर सुनील वर्मा हालांकि मामले की शिकायतों के बाद भ्र्ष्टाचार को छुपाने पेटी कॉन्ट्रेक्टर राकेश गुप्ता ने कुछ सुधार कार्य शुरू कर दिए है लेकिन प्रशासन के साथ किये गए करोड़ो के घपले की जांच होना आवश्यक है साथ ही जांच कर भविष्य में होने वाली किसी बड़ी दुर्घटना को रोका जा सकता
जांच न होने पर न्यायालय का खटखटाएंगे दरवाजा
स्थानीय नागरिकों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सारे सबूत जुटाए जा रहे है ताकि स्थानीय प्रशासन से जांच न होने की स्तिथि में कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा और जनता के हित के लिए पीआईएल दायर की जाएगी जिसमे ठेकेदार कंपनी एमपीआरडीसी लोकल प्रशासन और पुलिस को पार्टी बनाया जाएगा


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