सागर। शहर के ऐतिहासिक पी.टी.सी. (PTC) ग्राउंड को लेकर घमासान छिड़ गया है। एक तरफ जहां खाकी वर्दी पहनने का सपना देखने वाले सैकड़ों युवा इस मैदान पर अपना पसीना बहा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासन ने इस खेल मैदान को 47 दिनों के लिए 'सागर महोत्सव मेला' (सागर ट्रेड एण्ड क्राफ्ट फायर) के हवाले कर दिया है।
जवाहरलाल नेहरू पुलिस अकादमी (JNPA) द्वारा जारी आदेश के बाद शहर के युवाओं में उबाल है। विवाद का मुख्य केंद्र मेले की आयोजक डॉ. सुधा मलैया (अध्यक्ष, ओजस्विनी समदर्शी न्यास) हैं, जो रसूखदार राजनीतिक व्यक्तित्व मानी जाती हैं। युवाओं का सीधा आरोप है कि रसूख के आगे छात्रों के भविष्य को ताक पर रख दिया गया है।
47 दिन का 'वनवास', तैयारी पर फिरेगा पानी
पुलिस अकादमी के निदेशक कार्यालय से जारी आदेश क्रमांक 28/26 के अनुसार, यह मैदान 15 अप्रैल 2026 से 31 मई 2026 तक मेले के लिए आवंटित किया गया है।
- छात्रों का सवाल: "भर्ती परीक्षाएं सिर पर हैं, ऐसे में दो महीने तक हम अभ्यास कहां करेंगे?"
- प्रशासनिक तर्क: आदेश में साफ-सफाई और गड्ढे भरने की जिम्मेदारी आयोजकों पर डाली गई है, लेकिन छात्रों का कहना है कि मेले के बाद मैदान खेल के लायक नहीं बचता।
सियासी रसूख बनाम छात्रों का संघर्ष
मेले की अनुमति मिलने के पीछे डॉ. सुधा मलैया के राजनीतिक प्रभाव को जोड़कर देखा जा रहा है। युवाओं का कहना है कि शहर में अन्य कई खाली स्थान मौजूद थे, लेकिन जानबूझकर उस मैदान को चुना गया जो पुलिस भर्ती और फिजिकल एक्टिविटी का 'हब' माना जाता है। छात्रों ने दो टूक कहा है कि प्रशासन 'मनोरंजन' को 'भविष्य' से ऊपर रख रहा है।
उग्र आंदोलन की पदचाप: "मैदान छोड़ो या संघर्ष झेलो"
प्रशासन के इस फैसले के खिलाफ अब छात्र लामबंद हो चुके हैं। मैदान पर अभ्यास करने वाले युवाओं के समूह ने जिला प्रशासन और JNPA को चेतावनी दी है कि यदि यह अनुमति तत्काल रद्द नहीं की गई, तो सागर की सड़कों पर उग्र प्रदर्शन होगा।
युवाओं की गर्जना: "PTC ग्राउंड हमारी मेहनत की जगह है, इसे नुमाइश का अड्डा नहीं बनने देंगे। अगर प्रशासन ने अपना फैसला नहीं बदला, तो हम कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे।"
आदेश की शर्तें और हकीकत
सरकारी आदेश में सुरक्षा, पार्किंग और साफ-सफाई की जिम्मेदारी आयोजकों की तय की गई है, लेकिन 47 दिनों तक लगने वाली भीड़ और खुदाई से मैदान की जो दुर्दशा होगी, उसका खामियाजा सालों तक यहां दौड़ने वाले युवाओं को भुगतना पड़ेगा। अब देखना यह है कि प्रशासन छात्र शक्ति के आगे झुकता है या राजनीतिक रसूख के आगे युवाओं के सपनों की बलि दी जाती है।


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